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निपातों के प्रयोग
निपातों के प्रयोग 

निपातों के प्रयोग 

डाक्टर दीपशिप्त ने निपातो पर बिस्तारपूर्वक विचार किया है।  इस आधार पर हम निपातो के प्रयोग पर विचार करते है। 

(१) स्वीकारार्थक निपात - 

स्वीकारार्थक निपातो का प्रयोग प्रश्न का स्वीकारार्थक उत्तर, कथन की पुस्टि, विचार का ठीक होना आदि व्यक्त करने के लिए होता है। वे सदा वाक्य के अंत में आते है। इनमे सर्वाधिक हाँ निपात है , जैसे-
हाँ, ये सब लोग सिनेमा देखने जायेंगे। 
हाँ, अब हम लोगो को चल देना चाहिए। 
हाँ, निपात की पुनररुक्ति भी हो सकती है, जिसमे स्वीकृति के अर्थ को बल प्राप्त होता है। 
जैसे -हाँ,हाँ, मै पहुँचते ही खबर दूँगा। 
जी तथा जी हाँ निपातो का प्रयोग विनम्रता एवं आदर व्यक्त करने के लिए किया जाता है ; जैसे -जी हाँ, मै आपकी आज्ञानुसार डाक्टर साहब के पास गया था। हूँ निपात का प्रयोग तब होता है , जब उत्तर उत्तम पुरुष द्वारा किया जाता है और सम्बोधन बराबर के प्रति होता है ; जैसे -मजे में?- "हूँ "

(२) नकाराथक निपात- 

नकारार्थक निपात ही हिंदी में अस्वीकृति व्यक्त करने का प्रमुख साधन है। यह निश्चयार्थक प्रकार के वर्तमान काल और भूतकाल के रूपों के साथ ही सबसे अधिक प्रयुक्त होता है। जैसे -इतनी जल्दी कार्यक्रम नहीं बदला जा सकता। मुझे उसका रुपये मांगना अच्छा नहीं लगा। 

(३) निषेधात्मक निपात- 

मत निषेधात्मक निपात है। यह निपात क्रिया रूप से पूर्व या उसके पश्चात् दोनों ही स्थितियो में आ सकता है, जैसे-
मुझे मत छोड़ो वरना मै रो दूंगा। 
मुझे मारो मत मैंने कोई गलती नहीं की है। 
द्रस्टव्य यह है कि मत निपात का प्रयोग केवल आज्ञार्थक प्रकार के रूपों तथा इनके अर्थ में प्रयुक्त तुमर्थ के साथ दृढ़ना निषेध व्यक्त करने के लिए होता है। 

(४) प्रश्नार्थक निपात- 

यह निपात वाक्य में अन्य प्रश्नबोधक शब्दों में आभाव में वाक्य का प्रश्नार्थक स्वरुप व्यक्त करता है। यह प्रायः वाक्य के आरम्भ में आता है ,परन्तु अवधारण के लिए इसका प्रयोग वाक्य के अंत में भी कर दिया जाता है; जैसे-
क्या तुम मेरे साथ चलोगे? तुम मेरे साथ चलोगे क्या ?
क्यों निपात का प्रयोग सम्बोधन के साथ किया जाता है, जैसे-
क्यों जी ! क्या सोते ही रहोगे ?
क्यों भाई ! क्या आज स्कूल चलने का इरादा नहीं है ?
और ना निपात प्रश्नार्थक वाक्यों के अंत में प्रयुक्त होते है और वक्ता  के अनुतान के अनुसार प्रश्न में उसका विश्वास या संदेह प्रकट करते है, जैसे-
आप नंबर बढ़वाने आये है, न ? मै क्यों गलती नहीं कर रहा हूँ , न ?

(५) विषमयाधिबोधक निपात- 

क्या और काश निपात कथन को अधिक अभिव्यंजनात्मक बनाते है, जैसे -
क्या बढ़िया भोजन है ?
काश वे  आज नं आए ?

(६) बलप्रदायक - सीमाबोधक निपात - 

तो, तो भी, नहीं तो ही , भी कोई भी , कुछ भी ,जो भी, तब भी ,तक , जो - ये बलप्रदायक निपात है , इनके प्रयोग के सम्बन्ध में कतिपय सूत्र इस प्रकार है -
तो का प्रयोग - वाक्य के किसी भी अंग पर , चाहे वह किसी भी शब्द भेद द्वारा व्यक्त हो, बल देने के लिए ,उसकी ओर  ध्यान आकर्षित करने के लिए , जैसे-
वह तो इस समय घर पर ही होना चाहिए। 
आप है तो अच्छे ?
नहीं तो, तो भी - मुझे पता नहीं था नहीं तो मै इस समय नहीं आता। 
उसके लड़के का विवाह है, तो भी वह पूरी ड्यूटी दे रहा है। 
तो सही - मुझे छोडो तो सही, तुम्हारे काम करवा दूंगा। 
ही -उसके एक ही बच्चा था। 
उससे अच्छी हॉकी तो मै ही खेल सकता हूँ। 
हम लोग अभी तुम्हारी ही बात कर रहे थे। 
ज्योंही त्योंही , जैसे ही, वैसे ही-
ज्योंही उसने खबर दी , त्यों ही मै  रवांना हो गया। 
जैसे ही वह बोले, मैंने प्रणाम किया। 
साथ ही और यों ही - श्रीरामचन्द्र की वकालत  ठीक -ठीक चलती है।  साथ  ही वह कथा भी बाँचते है। 
तुम उससे माँग  कर तो देखो , वह बीसो आम वैसे ही दे देंगे। 
थोड़े ही, भले ही - मै तुमको थोड़े ही पहचानता हूँ। 
तुम मुझसे भले ही खींचे रहो, पर मै तो तुम्हारा काम करूँगा ही। 
वह कदाचित ही घर पर मिलेंगे। 
कितना ही, जितना ही- कितना ही संभाल  कर रखो , गर्मी में दूध फट  ही जाता है। 
बच्चे पर जितना ही लाड़  करो, वह उतना ही जिद्दी हो जाता  है। 
ही का प्रयोग पुनरुक्तियो के घटको के बीच -
वह पढ़ता  तो ठीक है, पर साथ ही साथ बहुत नटखट है। 
देखते ही देखते वह बेहोश होकर गिर पड़ा। 
उसकी मूर्खतापूर्ण बातो पर लोग मन ही मन हँसते है। 
जो -दोस्त जो समर्थन कर रहे है, वे ही तुम्हारी हंसी उड़ाते है। 
क्या करूँ, मै तुमसे प्रेम जो करता हूँ। 
मै इसी समय जाता हूँ , स्टेशन तक पैदल जाना है। 
 न और ना ये अपने वर्ग के निपातो से इस बात में भिन्न है कि  इनका प्रयोग शब्दों  शब्द बँधो  साथ नहीं , बल्कि पुरे वाक्यों के साथ होता है , ये निपात स्वीकार्थक और प्रेरणार्ताक वाक्यों के अंत में आते है , जैसे उस दिन तुम कलकत्ता से आए थे , मार्च की दो तारीख थी न ! धक्का देकर चलोगे , तो झगड़ा होगा न ! तुम तो वकील हो , इसका फैसला तुम्हीं कर दो न ! खाओ न ! गाओ  भी न !

(७)ध्यानार्थक - सीमाबोधक निपात - 

ध्यानार्थक -सीमाबोधक निपात का प्रयोग वाक्य में शब्दों की और तर्कसगत ध्यानाकर्षक के लिए  जाता है। 
भर ( पूर्णता ,समग्रता ) तुम  जन्म भर पढ़ते रहो, परन्तु तुमको चिट्टी लिखना न आया। 
आपको भले ही यह बात न मालूम हो , परन्तु इसको शहर भर जानता है। 
तुम रास्ते भर बाते करते रहे। 
भी - उसकी फीस माफ़ है , साथ ही छात्रबृत्ति भी मिलती है। 
शोरगुल शांत भी नहीं हुआ था कि पत्थर फिकने लगे। 
उठो भी 
यार, छोडो भी इन बातो को। 
मेरे मना करने पर भी वह यहाँ आ धमका। 
काम कितना भी अप्रिय क्यों न हो , तुमको करना ही होगा। 
कोई भी ,कुछ भी , जो भी -जो  कोई भी पहले आएगा , उसके नाम यह सौदा हो जायेगा। 
कुछ भी हो , मै  यह काम नहीं करूँगा। 
जो भी चाहे , मुझसे आकर पढ़ ले। 
फिर भी , तो भी , तब भी - पिता जी कुछ को भले ही कुछ न दे , फिर भी वह उनकी सेवा के लिए हर वक्त तैयार है। 
तुम्हारा नाम टीम में नहीं  था , तब भी तुम चले आए। 
और भी - मास्टर साहब ने पूछा , रामू ! तू क्यों रोटा है ? रामू की सिसकियाँ और भी तेज हो गई। 
तक - मैंने उसको देखा तक नहीं है।
वह इतना बीमार है कि  उससे उठा  तक नहीं जाता है। 
परिसीमन,सीमाबोध के अर्थ में भर  प्रयोग संज्ञा शब्दों और क्रियाओ के साथ होता है। 
जैसे -
मै तो उनका मित्र भर हूँ। 
यहाँ सोने के  लिए चारपाइयाँ भर है। 
मैंने उनको एक बार देखा भर है। 
मै कहे भर दूंगा, आगे तुम्हारा भाग्य। 
केवल, सिर्फ,मात्र - ये निपात किसी भी शब्द भेद के साथ प्रयुक्त हो सकते है,जिसकी और वक्ता ध्यान दिलाना चाहता है ,ये सदा इन् शब्दों के पूर्व स्थित होते है , जैसे - राम ने केवल यह जानने के लिए लौट-लौट कर देखा कि पीछे से वह पागल कुत्ता तो नहीं आ रहा है। 
भारत तो पाकिस्तान के साथ सिर्फ एक अच्छे पड़ौसी के सम्बन्ध चाहता है। 
तुम सिर्फ दस्तखत भर कर दो।  शेष काम मै देख लूंगा। 
मात्र 
मै जल मात्र चाहता हूँ। 
बीस रूपए मात्र से मेरा काम चल जायेगा। 
राम अपने पिता की एकमात्र संतान है। 

(८) तुलनात्मक - बलप्रदायक निपात (सा) -

इस निपात की यह विशिष्टता है कि इसका व्याकरणिक लिंग,वचन और कारक  होता है। इसका रूप आकारांत विशेषणों की भांति बदलते है। 
सा निपात का प्रयोग (सा,सी से ) संज्ञाओं ,विशेषणों,सर्वनामों,क्रियाओ तथा क्रिया -विशेषणों के साथ तुलना ,समानता अनुरूपत व्यक्त करने के लिए या तत्सम्बन्धी शब्द पर बल देने के लिए होता है। 
संज्ञाओं और सर्वनामों के साथ सा निपात तुलना, सदृश्यता,समरूपता का अर्थ व्यक्त करता है , इन शब्दों से इसका संयोजन सीधे ही या का परसर्ग द्वारा होता है। जैसे -
ऊँची पहाड़ी का शिखर धुंए का स्थिर पुंज सा जान पड़ता है। 
तू इस फूल सी बच्ची की हत्या करना चाहता है। 
कैसी पागलो की सी बाते  करते हो तुम?
क्रियाविशेषण कृदर्शो के साथ सा सा निपात से रूप आता है -
वह नौकर को घसीटते  हुए बाहर ले  गया। 
सा निपात कभी-कभी परसर्ग की भांति व्यवहृत होता है और इसके पूर्ववर्ती शब्द को तब विकारीकारक रूप ग्रहण करता होता है। जैसे -
तुझ सी लड़की, बच्चो सा खेल ,तुम सा कोई न था -आदि 

(९) आदरसूचक निपात -

आदरसूचक निपात जी  प्रयोग व्यक्तिवाचक संज्ञाओं के साथ तथा जातिवाचक संज्ञाओं के साथ भी होता है। यह निपात सम्बोधित या चर्चित व्यक्ति के प्रति आदर प्रकट करने के लिए प्रयुक्त होता है -गाँधी जी,वर्मा जी,पिताजी,गुरूजी जैसे -
बाबू जी ! मै वह तमाशा करूँगा कि आप देखते रह जाएंगे। 
जी - निपात का दूसरे शब्दों के साथ संयोजन के बिना स्वतंत्र प्रयोग भी होता है। जैसे -क्यों जी तुमने इसमें क्या देखा XX जी , आप यह रुपया अब अपने पास रखिए। 

(१०) अबधारणाबोधक निपात - 

अवधारणाबोधक निपात किसी कार्य या श्तिति के प्रति इंगित करने के लिए प्रयुक्त होते है , जैसे -
ठीक, यही पच्चीस नम्बर कमरा है। 
कल लगभग इसी समय वह यहाँ आया था। 
राम यहाँ करीब सात बजे आया था। 
तकरीबन, उसने यही कहा था। 

(११) निर्देशार्थक निपात -

निर्देशार्थक निपात ले लो आदि किसी वस्तु व्यक्ति को इंगित करने के लिए प्रयुक्त होते है ,जैसे - 
ले, आ गया राम। 
लो, खाना तैयार है। 
निर्देशवाचक सर्वनाम भी निर्देशवाचक निपातो के रूप प्रयुक्त होते है , जैसे -
उसने मूड कर कहा, "यही है गरीब XX और यह है दिल्ली जंक्शन के स्टेशन मास्टर। 
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