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भाषा और हिंदी भाषा  

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भाषा किसे कहते है
      भाषा:- हम अपने विचारो का आदान-प्रदान जिस साधन के माध्यम से करते है, उसे भाषा कहते है।  हम अपने विचारो, भावो तथा बातो को लिखकर,बोलकर,संकेतो द्वारा या ध्वनि के माध्यम से दूसरो तक पहुंचाते है।  सामान्यतः इन्ही को भाषा माना जाता है।  परन्तु यह बात सर्वथा सत्य नहीं है। क्योकि लिखना,बोलना,या संकेत करना यदि सार्थक न हो तो उसे भाषा नहीं कहा जा सकता। 
     'भाषा' शब्द 'भाष' धातु से बना है, जिसका अर्थ बोलना है।  जिन धवनि को बोलकर हम अपनी बात कहते है, उसे भाषा कहते है।  परन्तु इन ध्वनिओ का सार्थक और नियम बद्ध होना आवश्यक है।  भाषा बात कहने और समझने दोनों का ही माध्यम होती है। हम केवल बोलकर ही नहीं वरन लिखकर भी अपनी बात दूसरो तक पहुंचाते है। 
      इस प्रकार 
     ''भाषा वह साधन है, जिसके द्वारा मनुष्य अपने भावो तथा विचारो को बोलकर या लिखकर दूसरे मनुष्यो तक पहुंचाते है। ''
     भाषा का उदेश्य विचारो का आदान -प्रदान है।  आदान - प्रदान का आधार मौखिक ध्वनियाँ है। ध्वनिओं से सार्थक शब्दों का निर्माण होता है।  भाषा के लिए शब्दों का सही क्रम में होना अनिवार्य है।

 भाषा की परिभाषा

      कामताप्रसाद गुरु के अनुसार - ''भाषा वह साधन है, जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचार दुसरो पर भँली भांति प्रकट कर सकता है, और दुसरो के विचार आप स्पष्टया समझ सकता है. मनुष्य के कार्य उसके विचारो से उत्पन्न होते है और इन कार्यो में दुसरो की सहयता अथवा सम्मति प्राप्त करने के लिए उसको वे विचार दुसरो पर प्रकट करने पड़ते है. जगत का अधिकांश व्यवहार बोलचाल अथवा लिखापढ़ी से चलता है, इसलिए भाषा जगत के व्यवहार का मूल है, ''
      डॉ शयामसुन्दरदास के अनुसार - मनुष्य और मनुष्य के बीच वस्तुअों के विषय अपनी इच्छा और मति का आदान प्रदान करने के लिए व्यक्त ध्वनि-संकेतो का जो व्यवहार होता है, उसे भाषा कहते है।
     डॉ बाबुराम सक्सेना के अनुसार- जिन ध्वनि-चिंहों द्वारा मनुष्य परस्पर विचार-बिनिमय करता है उसको समष्टि रूप से भाषा कहते है।

 उपर्युक्त परिभाषाओं से निम्नलिखित निष्कर्ष निकलते है-
(1) भाषा में ध्वनि-संकेतों का परम्परागत और रूढ़ प्रयोग होता है।
(2) भाषा के सार्थक ध्वनि-संकेतों से मन की बातों या विचारों का विनिमय होता है।
(3) भाषा के ध्वनि-संकेत किसी समाज या वर्ग के आन्तरिक और ब्राह्य कार्यों के संचालन या विचार-विनिमय में सहायक होते हैं।
(4) हर वर्ग या समाज के ध्वनि-संकेत अपने होते हैं, दूसरों से भित्र होते हैं।

 भाषा के लक्षण 

 (i)  मानव-मुख से निस्सृत
 (ii) निश्चित ध्वनि रूप
 (iii) पूर्व निर्धारित
 (iv) सामाजिकता
 (v) अर्जित संपत्ति

भाषा की प्रकृति 

     भाषा की प्रकृति नदी नदी की भांति प्रवहमान होती है. उसकी धारा निरंतर बहती रहती है और उसमे परिबर्तन होते है. कबीरदास के शब्दों में 'भाषा बहता नीर है। 
     भाषा एक सामाजिक शक्ति है, इसको मनुष्य स्वभावतया प्राप्त करता है. साथ ही उसे वह अपने पूर्वजो से सीखता और उसका विकास करता है, इस प्रकार वह अर्जित और परम्परागत दोनों है , देश और काल  के अनुसार भाषा अनेक रूप होते है. अथवा वह अनेक रूपों में बटी होती है, यही कारण है कि संसार में अनेक भाषाए प्रचलित है। 

भाषा के रूप 

भाषा निम्नलिखित तीन रूपों में पायी जाती है:-
1. मौखिक भाषा    2. लिखित भाषा   3. सांकेतिक भाषा 
 1. मौखिक भाषा:- आदि मानव आज के मानव जैसे नहीं था, वह लिखना या पढ़ना नहीं जनता था। मनुष्य ने सबसे पहले अपने विचारो के आदान-प्रदान के लिए मौखिक भाषा का ही प्रयोग किया। मुख द्वारा बोली जाने वाली भाषा को मौखिक भाषा कहते है। 
 2. लिखित भाषा :- अब हम अपने विचारो और भावो को लिखकर प्रकट करते है।  भाषा के इस रूप को लिखित भाषा कहते है। भाषा का यह रूप मौखिक की अपेक्षा अधिक उपयोगी और व्यस्थित है। इसी के माध्यम से विचारो और भावो को अधिक दिन तक सुरक्षित रखा जा सकता है। लिखित भाषा को सीखने के लिए मनुष्य को प्रयत्न करना पड़ता है। 
3. सांकेतिक भाषा:- वैसे तो सांकेतिक भाषा का प्रयोग मानव लिखित भाषा के जन्म से पहले से ही करता रहा है, परन्तु आधुनिक युग में इसका अपना अलग महत्व है। जब हम अपनी बात हाथ, मुँह या आँखों के संकेतो द्वारा कहते है तो भाषा के इस रूप को सांकेतिक भाषा कहते है।  सांकेतिक भाषा के इस रूप का प्रयोग चौराहे का सिपाही, स्काउट और गुटचर करते है।  गूंगे बहरे लोग संकेतो द्वारा ही बातो करते है। 

हिंदी भाषा 

बहुत सारे विद्वानों का मत है कि हिन्दी भाषा संस्कृत से निष्पन्न है; परन्तु यह बात सत्य नहीं है। हिन्दी की उत्पत्ति अपभ्रंश भाषाओं से हुई है और अपभ्रंश की उत्पत्ति प्राकृत से। प्राकृत भाषा अपने पहले की पुरानी बोलचाल की संस्कृत से निकली है। स्पष्ट है कि हमारे आदिम आर्यों की भाषा पुरानी संस्कृत थी। उनके नमूने ऋग्वेद में दिखते हैं। उसका विकास होते-होते कई प्रकार की प्राकृत भाषाएँ पैदा हुई। हमारी विशुद्ध संस्कृत किसी पुरानी प्राकृत से ही परिमार्जित हुई है। प्राकृत भाषाओं के बाद अपभ्रशों और शौरसेनी अपभ्रंश से निकली है।
हिन्दी भाषा और उसका साहित्य किसी एक विभाग और उसके साहित्य के विकसित रूप नहीं हैं; वे अनेक विभाषाओं और उनके साहित्यों की समष्टि का प्रतिनिधित्व करते हैं। एक बहुत बड़े क्षेत्र- जिसे चिरकाल से मध्यदेश कहा जाता रहा है- की अनेक बोलियों के ताने-बाने से बुनी यही एक ऐसी आधुनिक भाषा है, जिसने अनजाने और अनौपचारिक रीति से देश की ऐसी व्यापक भाषा बनने का प्रयास किया था, जैसी संस्कृत रहती चली आई थी; किन्तु जिसे किसी नवीन भाषा के लिए अपना स्थान तो रिक्त करना ही था।

वर्तमान हिन्दी भाषा का क्षेत्र बड़ा ही व्यापक हो चला। है इसे निम्नलिखित विभागों में बाँटा गया हैं-
(क) बिहारी भाषा : बिहारी भाषा बँगला भाषा से अधिक संबंध रखती है। यह पूर्वी उपशाखा के अंतर्गत है और बँगला, उड़िया और आसामी की बहन लगती है। इसके अंतर्गत निम्न बोलियाँ हैं- मैथली, मगही, भोजपुरी, पूर्वी आदि। मैथली के प्रसिद्ध कवि विद्यापति ठाकुर और भोजपुरी के बहुत बड़े प्रचारक भिखारी ठाकुर हुए।
(ख) पूर्वी हिन्दी : अर्द्धमागधी प्राकृत के अप्रभ्रंश से पूर्वी हिन्दी निकली है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस जैसे महाकाव्यों की रचना पूर्वी हिन्दी में ही की। दूसरी तीन बोलियाँ हैं- अवध, बघेली और छत्तीसगढ़ी। मलिक मोहम्मद जायसी ने अपनी प्रसिद्ध रचनाएँ इसी भाषा में लिखी हैं।
(ग) पश्चिमी हिन्दी : पूर्वी हिन्दी तो बाहरी और भीतरी दोनों शाखाओं की भाषाओं के मेल से बनी हैं; परन्तु पश्चिमी हिन्दी का संबंध भीतरी शाखा से है।

यह राजस्थानी, गुजराती और पंजाबी से संबंध रखती है। इस भाषा के कई भेद हैं- हिन्दुस्तानी, ब्रज, कनौजी, बुँदेली, बाँगरू और दक्षिणी।
गंगा-यमुना के बीच मध्यवर्ती प्रान्त में और दक्षिण दिल्ली से इटावे तक ब्रजभाषा बोली जाती है। गुड़गाँव और भरतपुर, करोली और ग्वालियर तक ब्रजभाषी हैं। इस भाषा के कवियों में सूरदास और बिहारीलाल ज्यादा चर्चित हुए।
कन्नौजी, ब्रजभाषा से बहुत कुछ मिलती-जुलती है। इटावा से इलाहाबाद तक इसके बोलनेवाले हैं। अवध के हरदोई और उन्नाव में यही भाषा बोली जाती है।
बुँदेली बुंदेलखंड की बोली है। झाँसी, जालौन, हमीरपुर और ग्वालियर के पूर्वी प्रान्त, मध्य प्रदेश के दमोह छत्तीसगढ़ के रायपुर, सिउनी, नरसिंहपुर आदि स्थानों की बोली बुँदेली है। छिंदवाड़ा और हुशंगाबाद के कुछ हिस्सों में भी इसका प्रचार है।

हिसार, झींद, रोहतक, करनाल आदि जिलों में बाँगरू भाषा बोली जाती है। दिल्ली के आसपास की भी यही भाषा है।
दक्षिण के मुसलमान जो हिन्दी बोलते हैं उसका नाम दक्षिणी हिन्दी है। इसके बोलनेवाले मुंबई, बरोदा, बरार, मध्य प्रदेश, कोचीन, कुग, हैदराबाद, चेन्नई, माइसोर और ट्रावनकोर तक फैले हैं। इन क्षेत्रों के लोग मुझे या मुझको की जगह 'मेरे को' बोलते हैं।
हिन्दुस्तानी भाषा के दो रूप हैं। एक तो वह जो पश्चिमी हिन्दी की शाखा है, दूसरी वह जो साहित्य में काम आती है। पहली गंगा-यमुना के बीच का जो भाग है उसके उत्तर में रुहेलखंड में और अम्बाला जिले के पूर्व में बोली जाती है। यह पश्चिमी हिन्दी की शाखा है। यही धीरे-धीरे पंजाबी में परिणत हुई। मेरठ के आस-पास और उसके कुछ उत्तर में यह भाषा अपने विशुद्ध रूप में बोली जाती है। वहाँ उसका वही रूप है, जिसके अनुसार हिन्दी का व्याकरण बना है। रुहेलखंड में यह धीरे-धीरे कन्नौजी में और अंबाले में पंजाबी में परिणत हो गई है। अर्थात हिन्दुस्तानी और कुछ नहीं, सिर्फ ऊपरी दोआब की स्वदेशी भाषा है। दिल्ली में मुसलमानों के सहयोग से हिन्दी भाषा का विकास बहुत बढ़ा।

वर्तमान समय में इस भाषा का प्रचार इतना बढ़ गया है कि कोई प्रान्त, सूबा या शहर ऐसा नहीं रह गया है जहाँ इसके बोलनेवाले न हों। बंगाली, मद्रासी, गुजराती, मराठी, नेपाली आदि भिन्न भाषाएँ हैं फिर भी ये भाषा-भाषी हिन्दी को समझ लेते हैं। इसका व्याकरण वैज्ञानिक है। इस भाषा में संस्कृत के अलावा फ्रेंच, जापानी, बर्मी, चीनी, अंग्रेजी, पुर्तगाली आदि अनेकानेक भाषाओं के शब्दों की भरमार है। अतएव, इस भाषा का फैलाव बहुत तेजी से हुआ है। यही कारण है कि आज यह राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त कर चुकी है।  
बोली :- किसी विशेष क्षेत्र में मौखिक बोली जाने वाली भाषा को बोली कहते है। यह केवल बोलने के ही काम आती है। यदि बारीकी से अध्धयन किया जाय तो प्रत्येक गांव में कुछ विशेष शब्द होते है जिन्हे केवल उसी गांव के लोग अपनी बोल चाल में प्रयोग करते है।  इसलिए कहा जाता है कि 'बोली ' में भी बोलिया होती है। 
लिपि:- लिपि और भाषा का घनिष्ठ संबंध है।  मौखिक भाषा को लिखित रूप देने के लिए लिपि का ही प्रयोग किया जाता है।  प्रत्येक लिखित भाषा वर्णो या अक्षरों द्वारा ही लिखी जाती है।  इन अक्षरों के लिए किसी न  किसी चिन्ह का प्रयोग किया जाता है।  भाषा को लिखित रूप देने के लिए ध्वनि चिन्हो को लिखने के ढंग को लिपि कहते है। 
     विभिन्न भाषाओ को लिखने के लिए अलग-अलग लिपियों का प्रयोग किया जाता है जैसे हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी है, पंजाबी भाषा की गुरूमुखी है तथा अंग्रेजी भाषा की लिपि रोमन है।
साहित्य :-'साहित्य समाज का का दर्पण होता है। ' किसी भाषा के ज्ञान के भंडार को उस भाषा का साहित्य कहते है।  साहित्य में किसी देश और  जाति के लोगो के विचार और भाव लिखित रूप में व्यक्त होते है। यदि किसी देश या समाज की ज्ञान और संस्कृति की जानकारी प्राप्त करनी हो तो वह तत्कालीन साहित्य से ही जानी जा सकती है। साहित्य गद्य और पद्य दोनों ही रूप में होते है।
भाषा और बोली में अंतर:- यह अंतर प्राय तीन प्रकार का होता है - (क ) बोली का परिनिष्ठित रूप नहीं होता है,  भाषा का एक परिनिष्ठित रूप होता है। (ख) बोली में विविधरूपता का प्रायः आभाव होता है जबकि विविधरूपता भाषा का प्राण होता है तथा (ग ) अनेक बोलिया के सामूहिक रूप का नाम भाषा है।  ये बोलिया ही भाषा को  जीवन - रस प्रदान करती है।  उदाहरण के ब्रजी,बुंदेली, कन्नौजी,बांगरू,वैसवाड़ी आदि अनेक बोलिया का क्षेत्र हिंदी  का क्षेत्र बनता है और उनका सामूहिक रूप ही हिंदी कहा जाता है।




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