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nipat ka prayog in hindi | निपात अव्यय के उदाहरण | निपातों के प्रयोग

निपातों के प्रयोग
निपातों के प्रयोग 

निपातों के प्रयोग 

डाक्टर दीपशिप्त ने निपातो पर बिस्तारपूर्वक विचार किया है।  इस आधार पर हम निपातो के प्रयोग पर विचार करते है। 

(१) स्वीकारार्थक निपात - 

स्वीकारार्थक निपातो का प्रयोग प्रश्न का स्वीकारार्थक उत्तर, कथन की पुस्टि, विचार का ठीक होना आदि व्यक्त करने के लिए होता है। वे सदा वाक्य के अंत में आते है। इनमे सर्वाधिक हाँ निपात है , जैसे-
हाँ, ये सब लोग सिनेमा देखने जायेंगे। 
हाँ, अब हम लोगो को चल देना चाहिए। 
हाँ, निपात की पुनररुक्ति भी हो सकती है, जिसमे स्वीकृति के अर्थ को बल प्राप्त होता है। 
जैसे -हाँ,हाँ, मै पहुँचते ही खबर दूँगा। 
जी तथा जी हाँ निपातो का प्रयोग विनम्रता एवं आदर व्यक्त करने के लिए किया जाता है ; जैसे -जी हाँ, मै आपकी आज्ञानुसार डाक्टर साहब के पास गया था। हूँ निपात का प्रयोग तब होता है , जब उत्तर उत्तम पुरुष द्वारा किया जाता है और सम्बोधन बराबर के प्रति होता है ; जैसे -मजे में?- "हूँ "

(२) नकाराथक निपात- 

नकारार्थक निपात ही हिंदी में अस्वीकृति व्यक्त करने का प्रमुख साधन है। यह निश्चयार्थक प्रकार के वर्तमान काल और भूतकाल के रूपों के साथ ही सबसे अधिक प्रयुक्त होता है। जैसे -इतनी जल्दी कार्यक्रम नहीं बदला जा सकता। मुझे उसका रुपये मांगना अच्छा नहीं लगा। 

(३) निषेधात्मक निपात- 

मत निषेधात्मक निपात है। यह निपात क्रिया रूप से पूर्व या उसके पश्चात् दोनों ही स्थितियो में आ सकता है, जैसे-
मुझे मत छोड़ो वरना मै रो दूंगा। 
मुझे मारो मत मैंने कोई गलती नहीं की है। 
द्रस्टव्य यह है कि मत निपात का प्रयोग केवल आज्ञार्थक प्रकार के रूपों तथा इनके अर्थ में प्रयुक्त तुमर्थ के साथ दृढ़ना निषेध व्यक्त करने के लिए होता है। 

(४) प्रश्नार्थक निपात- 

यह निपात वाक्य में अन्य प्रश्नबोधक शब्दों में आभाव में वाक्य का प्रश्नार्थक स्वरुप व्यक्त करता है। यह प्रायः वाक्य के आरम्भ में आता है ,परन्तु अवधारण के लिए इसका प्रयोग वाक्य के अंत में भी कर दिया जाता है; जैसे-
क्या तुम मेरे साथ चलोगे? तुम मेरे साथ चलोगे क्या ?
क्यों निपात का प्रयोग सम्बोधन के साथ किया जाता है, जैसे-
क्यों जी ! क्या सोते ही रहोगे ?
क्यों भाई ! क्या आज स्कूल चलने का इरादा नहीं है ?
और ना निपात प्रश्नार्थक वाक्यों के अंत में प्रयुक्त होते है और वक्ता  के अनुतान के अनुसार प्रश्न में उसका विश्वास या संदेह प्रकट करते है, जैसे-
आप नंबर बढ़वाने आये है, न ? मै क्यों गलती नहीं कर रहा हूँ , न ?

(५) विषमयाधिबोधक निपात- 

क्या और काश निपात कथन को अधिक अभिव्यंजनात्मक बनाते है, जैसे -
क्या बढ़िया भोजन है ?
काश वे  आज नं आए ?

(६) बलप्रदायक - सीमाबोधक निपात - 

तो, तो भी, नहीं तो ही , भी कोई भी , कुछ भी ,जो भी, तब भी ,तक , जो - ये बलप्रदायक निपात है , इनके प्रयोग के सम्बन्ध में कतिपय सूत्र इस प्रकार है -
तो का प्रयोग - वाक्य के किसी भी अंग पर , चाहे वह किसी भी शब्द भेद द्वारा व्यक्त हो, बल देने के लिए ,उसकी ओर  ध्यान आकर्षित करने के लिए , जैसे-
वह तो इस समय घर पर ही होना चाहिए। 
आप है तो अच्छे ?
नहीं तो, तो भी - मुझे पता नहीं था नहीं तो मै इस समय नहीं आता। 
उसके लड़के का विवाह है, तो भी वह पूरी ड्यूटी दे रहा है। 
तो सही - मुझे छोडो तो सही, तुम्हारे काम करवा दूंगा। 
ही -उसके एक ही बच्चा था। 
उससे अच्छी हॉकी तो मै ही खेल सकता हूँ। 
हम लोग अभी तुम्हारी ही बात कर रहे थे। 
ज्योंही त्योंही , जैसे ही, वैसे ही-
ज्योंही उसने खबर दी , त्यों ही मै  रवांना हो गया। 
जैसे ही वह बोले, मैंने प्रणाम किया। 
साथ ही और यों ही - श्रीरामचन्द्र की वकालत  ठीक -ठीक चलती है।  साथ  ही वह कथा भी बाँचते है। 
तुम उससे माँग  कर तो देखो , वह बीसो आम वैसे ही दे देंगे। 
थोड़े ही, भले ही - मै तुमको थोड़े ही पहचानता हूँ। 
तुम मुझसे भले ही खींचे रहो, पर मै तो तुम्हारा काम करूँगा ही। 
वह कदाचित ही घर पर मिलेंगे। 
कितना ही, जितना ही- कितना ही संभाल  कर रखो , गर्मी में दूध फट  ही जाता है। 
बच्चे पर जितना ही लाड़  करो, वह उतना ही जिद्दी हो जाता  है। 
ही का प्रयोग पुनरुक्तियो के घटको के बीच -
वह पढ़ता  तो ठीक है, पर साथ ही साथ बहुत नटखट है। 
देखते ही देखते वह बेहोश होकर गिर पड़ा। 
उसकी मूर्खतापूर्ण बातो पर लोग मन ही मन हँसते है। 
जो -दोस्त जो समर्थन कर रहे है, वे ही तुम्हारी हंसी उड़ाते है। 
क्या करूँ, मै तुमसे प्रेम जो करता हूँ। 
मै इसी समय जाता हूँ , स्टेशन तक पैदल जाना है। 
 न और ना ये अपने वर्ग के निपातो से इस बात में भिन्न है कि  इनका प्रयोग शब्दों  शब्द बँधो  साथ नहीं , बल्कि पुरे वाक्यों के साथ होता है , ये निपात स्वीकार्थक और प्रेरणार्ताक वाक्यों के अंत में आते है , जैसे उस दिन तुम कलकत्ता से आए थे , मार्च की दो तारीख थी न ! धक्का देकर चलोगे , तो झगड़ा होगा न ! तुम तो वकील हो , इसका फैसला तुम्हीं कर दो न ! खाओ न ! गाओ  भी न !

(७)ध्यानार्थक - सीमाबोधक निपात - 

ध्यानार्थक -सीमाबोधक निपात का प्रयोग वाक्य में शब्दों की और तर्कसगत ध्यानाकर्षक के लिए  जाता है। 
भर ( पूर्णता ,समग्रता ) तुम  जन्म भर पढ़ते रहो, परन्तु तुमको चिट्टी लिखना न आया। 
आपको भले ही यह बात न मालूम हो , परन्तु इसको शहर भर जानता है। 
तुम रास्ते भर बाते करते रहे। 
भी - उसकी फीस माफ़ है , साथ ही छात्रबृत्ति भी मिलती है। 
शोरगुल शांत भी नहीं हुआ था कि पत्थर फिकने लगे। 
उठो भी 
यार, छोडो भी इन बातो को। 
मेरे मना करने पर भी वह यहाँ आ धमका। 
काम कितना भी अप्रिय क्यों न हो , तुमको करना ही होगा। 
कोई भी ,कुछ भी , जो भी -जो  कोई भी पहले आएगा , उसके नाम यह सौदा हो जायेगा। 
कुछ भी हो , मै  यह काम नहीं करूँगा। 
जो भी चाहे , मुझसे आकर पढ़ ले। 
फिर भी , तो भी , तब भी - पिता जी कुछ को भले ही कुछ न दे , फिर भी वह उनकी सेवा के लिए हर वक्त तैयार है। 
तुम्हारा नाम टीम में नहीं  था , तब भी तुम चले आए। 
और भी - मास्टर साहब ने पूछा , रामू ! तू क्यों रोटा है ? रामू की सिसकियाँ और भी तेज हो गई। 
तक - मैंने उसको देखा तक नहीं है।
वह इतना बीमार है कि  उससे उठा  तक नहीं जाता है। 
परिसीमन,सीमाबोध के अर्थ में भर  प्रयोग संज्ञा शब्दों और क्रियाओ के साथ होता है। 
जैसे -
मै तो उनका मित्र भर हूँ। 
यहाँ सोने के  लिए चारपाइयाँ भर है। 
मैंने उनको एक बार देखा भर है। 
मै कहे भर दूंगा, आगे तुम्हारा भाग्य। 
केवल, सिर्फ,मात्र - ये निपात किसी भी शब्द भेद के साथ प्रयुक्त हो सकते है,जिसकी और वक्ता ध्यान दिलाना चाहता है ,ये सदा इन् शब्दों के पूर्व स्थित होते है , जैसे - राम ने केवल यह जानने के लिए लौट-लौट कर देखा कि पीछे से वह पागल कुत्ता तो नहीं आ रहा है। 
भारत तो पाकिस्तान के साथ सिर्फ एक अच्छे पड़ौसी के सम्बन्ध चाहता है। 
तुम सिर्फ दस्तखत भर कर दो।  शेष काम मै देख लूंगा। 
मात्र 
मै जल मात्र चाहता हूँ। 
बीस रूपए मात्र से मेरा काम चल जायेगा। 
राम अपने पिता की एकमात्र संतान है। 

(८) तुलनात्मक - बलप्रदायक निपात (सा) -

इस निपात की यह विशिष्टता है कि इसका व्याकरणिक लिंग,वचन और कारक  होता है। इसका रूप आकारांत विशेषणों की भांति बदलते है। 
सा निपात का प्रयोग (सा,सी से ) संज्ञाओं ,विशेषणों,सर्वनामों,क्रियाओ तथा क्रिया -विशेषणों के साथ तुलना ,समानता अनुरूपत व्यक्त करने के लिए या तत्सम्बन्धी शब्द पर बल देने के लिए होता है। 
संज्ञाओं और सर्वनामों के साथ सा निपात तुलना, सदृश्यता,समरूपता का अर्थ व्यक्त करता है , इन शब्दों से इसका संयोजन सीधे ही या का परसर्ग द्वारा होता है। जैसे -
ऊँची पहाड़ी का शिखर धुंए का स्थिर पुंज सा जान पड़ता है। 
तू इस फूल सी बच्ची की हत्या करना चाहता है। 
कैसी पागलो की सी बाते  करते हो तुम?
क्रियाविशेषण कृदर्शो के साथ सा सा निपात से रूप आता है -
वह नौकर को घसीटते  हुए बाहर ले  गया। 
सा निपात कभी-कभी परसर्ग की भांति व्यवहृत होता है और इसके पूर्ववर्ती शब्द को तब विकारीकारक रूप ग्रहण करता होता है। जैसे -
तुझ सी लड़की, बच्चो सा खेल ,तुम सा कोई न था -आदि 

(९) आदरसूचक निपात -

आदरसूचक निपात जी  प्रयोग व्यक्तिवाचक संज्ञाओं के साथ तथा जातिवाचक संज्ञाओं के साथ भी होता है। यह निपात सम्बोधित या चर्चित व्यक्ति के प्रति आदर प्रकट करने के लिए प्रयुक्त होता है -गाँधी जी,वर्मा जी,पिताजी,गुरूजी जैसे -
बाबू जी ! मै वह तमाशा करूँगा कि आप देखते रह जाएंगे। 
जी - निपात का दूसरे शब्दों के साथ संयोजन के बिना स्वतंत्र प्रयोग भी होता है। जैसे -क्यों जी तुमने इसमें क्या देखा XX जी , आप यह रुपया अब अपने पास रखिए। 

(१०) अबधारणाबोधक निपात - 

अवधारणाबोधक निपात किसी कार्य या श्तिति के प्रति इंगित करने के लिए प्रयुक्त होते है , जैसे -
ठीक, यही पच्चीस नम्बर कमरा है। 
कल लगभग इसी समय वह यहाँ आया था। 
राम यहाँ करीब सात बजे आया था। 
तकरीबन, उसने यही कहा था। 

(११) निर्देशार्थक निपात -

निर्देशार्थक निपात ले लो आदि किसी वस्तु व्यक्ति को इंगित करने के लिए प्रयुक्त होते है ,जैसे - 
ले, आ गया राम। 
लो, खाना तैयार है। 
निर्देशवाचक सर्वनाम भी निर्देशवाचक निपातो के रूप प्रयुक्त होते है , जैसे -
उसने मूड कर कहा, "यही है गरीब XX और यह है दिल्ली जंक्शन के स्टेशन मास्टर। 
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viram chinh kise kahate hain | विराम चिन्ह किसे कहते हैं

 विराम चिन्ह किसे कहते हैं

विराम चिन्ह किसे कहते हैं
विराम चिन्ह किसे कहते हैं

विराम चिन्ह किसे कहते हैं

    हिंदी में विराम चिन्ह 

    विराम चिन्ह का शाब्दिक अर्थ है-'रुकना' अथवा 'ठहराव' केखन में भावाभिव्यक्ति की स्पष्टता के लिए विराम चिन्ह की आवश्यकता होती है। डाक्टर भोलेनाथ तिवारी के अनुसार - ''जो चिन्ह बोलते या पढ़ते समय रूकने का संकेत देते है, उन्हें विराम चिन्ह कहते है। '' विराम चिन्हो में अब तक अनेक चिन्ह सम्मिलित कर लिए गए है। यद्यपि सभी का काम रूकने का संकेत देना नहीं है तथापि विराम चिन्हो के अंतर्गत परंपरा से प्रयोग होते रहने के कारण इन्हे भी विराम चिन्हो के रूप ही जाना जाता है।
    अर्थ के स्पष्टीकरण में विराम चिन्ह की कितनी उपयोगिता है। यह निम्नलिखित उदहारण से स्पष्ट हो जाता है। राधा गई। यह एक सामान्य वाक्य है किन्तु विराम चिन्ह लगाने के बाद यह 'प्रश्नवाचक' और आश्चर्यबोधक भावो का अलग-अलग बोध कराता है -
(१) राधा घर गई। (सामान्य)
(२) राधा घर गई ? (प्रश्नवाचक)
(३) राधा घर गई ! (विस्मयादिबोधक) 
विराम चिन्ह किसे कहते हैं 
इसके अतिरिक्त विराम चिन्हो के प्रयोग से उच्चारण और वाचन  की गति  सुविधा रहती है। 
हिंदी में विराम चिन्ह  रूप में निम्नलिखित चिन्हो का प्रयोग होता है -
(१) पूर्ण विराम (। )
(२) अर्ध विराम (;)
(३) अल्प विराम (,)
(४) योगक चिन्ह (-)
(५) प्रश्नवाचक (?)
(६) विस्मयसूचक चिन्ह (!)
इसके अतिरिक्त भी कुछ चिन्ह विराम  चिन्ह के अंतर्गत गिनाए जाते है। शुद्ध लेखन और पठन की दृस्टि से इनकी उपयोगिता सयंसिद्ध है -
(१) विवरण चिन्ह :-)
(२) उद्धरण चिन्ह ('  ')
(३) कोष्ठक चिन्ह  (  ), _____
(४) संक्षेपसूचक चिन्ह (.)
(५) बिंदु रेखा (--------------)
(६) निर्देश चिन्ह (__)
विराम चिन्ह किसे कहते हैं 

(१) पूर्ण विराम 

    पूर्ण विराम का अर्थ है ,पूरी  तरह रूकना या ठहरना।  सामान्यता पढ़ते समय जहाँ वाक्य  की गति समाप्त हो जाए , वहां पूर्ण विराम का प्रयोग होता है। वाक्य छोटा हो या बढ़ा - प्रत्येक वाक्य की समाप्ति पर पूर्ण विराम लगाया जाना चाहिए , जैसे -वह घर गया गया, हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है। परिश्रम ही सफलता की कुंजी है। 
कभी-कभी किसी व्यक्ति या वास्तु का सजीव वर्णन करते समय वाक्यांशों के अंत में पूर्ण विराम लगाया जाता है , जैसे- गोरा रंग. गालो पर कश्मीरी सेब की सी सुर्खी।  सिर के बाल न अधिक बड़े ,न अधिक छोटे।  कानो  बालो में कुछ सफेदी।  पानीदार बड़ी-बड़ी आँखे ,  चौड़ा माथा। 
यहाँ व्यक्ति की मुखमुद्रा का विविध वाक्यांशों में सजीव वर्णन किया गया है। अतः ऐसे स्थलों पर पूर्ण विराम का का उचित प्रयोग हुआ है। 
विराम चिन्ह किसे कहते हैं 

(२) अर्ध विराम 

    इसका प्रयोग प्रायः काम होता है क्योकि अर्धविराम की जगत अल्पविराम लगाकर काम चला लिया जाता है। अर्धविराम का प्रयोग निम्नलिखित स्थितियों में होता है-
(i) एक वाक्य यदि दूसरे  सम्बन्ध हो और बात पूरी न हो तो पहले वाक्य के अंत में अर्धविराम लगता है। जैसे-मै आपका काम दूंगा ; आप निश्चित रहें।  
(ii) एक ही वाक्य में उदाहरण स्वरुप कई पदबंध होने पर अर्धविराम का प्रयोग होता है, जैसे-कही तो विनाश, कहीं मिलान तो कहीं विछोह: कहीं उत्थान तो कहीं पतन: यहीं प्रकृति की गति है। 
(iii) एक से अधिक उपाधि लिखने पर उनके बीच अर्धविराम का प्रयोग होता है, जैसे-एम्. ए., पी. एच. डी./एम्.बी.एस., एम्. डी.
(iv) कोश में एक शब्द के अलग-अलग अर्थ व्यक्त करने के लिए अर्धविराम का प्रयोग होता है। 
विराम चिन्ह किसे कहते हैं 

(३) अल्पविराम 

    हिंदी के विराम चिन्हो में अल्पविराम का प्रयोग सर्वाधिक होता है। 'अल्पविराम' का अर्थ है थोड़ी देर के लिए रूकना या ठहरना।  लिखते -पड़ते समय अनेक ऐसी भाव दशांए आती है जब थोड़ी देर रूकना पड़ता है।  अल्पविराम निम्नलिखित परिस्थितियों में प्रयोग किया जाता है -
(i)    वाक्य  में जब दो से अधिक पदों,पद्यांशों अथवा वाक्यों में जहाँ और का प्रयोग किया जा सकता हो ,अल्प विराम का प्रयोग होता है। 
(ii)    वाक्य में जब दो से अधिक पदों,पद्यांशों अथवा वाक्यों में जहाँ और का प्रयोग किया जा सकता है , अल्पविराम का प्रयोग होता है, जैसे- भारत में हिन्दू, मुसलमान, सिख और ईसाई सभी को समान अधिकार प्राप्त है। 
    आत्मा,अजर,अमर और अविनाशी है। वह रोज आता है , काम करता है और चला जाता है, 
    अंग्रेजी के प्रभाव के कारण अब 'और' के पहले भी अल्पविराम का प्रयोग होने लगा है जो हिंदी की प्रकृति के अनुकूल नहीं कहा जा सकता। 
विराम चिन्ह किसे कहते हैं 
(iii)    भावावेश में जहाँ शब्दों भी पुनरावृत्ति होती है, वहां अल्पविराम का प्रयोग होता है।  जैसे-
    नहीं, नहीं ऐसा कभी नहीं हो सकता। 
    देखो, देखो, पिताजी घर लौट आए। 
(iv)  यदि वाक्य में कोई अन्तर्वती वाक्य खंड आ जाय तब अल्पविराम का प्रयोग होता है, जैसे-
        आलस्य चाहें जिस रूप में हो, व्यक्ति को दरिद्र बनाता है। 
        क्रोध चाहें जैसे भी हो, मनुष्य को दुर्बल बनाता है।     
(v)    यदि वाक्यों के बीच में पर, इसीसे,इसलिए,किन्तु,परन्तु,अतः,क्योकि जिससे तथापि आदि अवयवों का प्रयोग होता है।  वहां अल्पविराम लगाया जा सकता है, उदहारण देखे-
        वह निर्धन है,किन्तु बेईमान नहीं। 
        मैं अव्यवसायी हूँ , इसलिए सफल होता है। 
        ऐसा कोई काम न करो , जिससे अपयश मिले। 
        वह वापस आ गया , क्योकि बाजार बंद था। 
(iv)    वस्तुतः अच्छा,बस,हाँ,नहीं,सचमुच,अंततः आदि से प्रारम्भ होने वाले वाक्यों में , इन शब्दों के बाद अल्पविराम लगता है , जैसे-
    अच्छा,कब मिलेंगे। 
    नहीं, मै वहाँ नहीं जाऊंगा। 
विराम चिन्ह किसे कहते हैं 

(४) योजक चिन्ह -  

योजक चिन्ह का प्रयोग निम्नलिखित अवसरों पर जाता है -
(i) द्वन्द समास से बने पदों में-
राम-श्याम, देश-विदेशी 
(ii) समान अर्थ वाले युग्म शब्दों में-
रुपये-पैसा, मान -मर्यादा 
(iii) विलोम शब्दों के बीच -
अमीर-गरीब,ऊँच -नीच 
(iv) एक शब्द की पुनरावृति में-
घर-घर, अच्छा-अच्छा 
(v) निश्चित तथा अनिश्चित संख्यावाचक शब्दों में -
तीन-चार ,कम -से -कम 
(vi) दो शब्दों के बीच का, की के लुप्त होने पर-
लेखन -कला , जन्म -भूमि , शब्द -सागर ,राम -लीला 
(vii) शब्दों के बीच ही, से,का,न, का प्रयोग होने पर -
किसी-न-किसी, ज्यों-का-त्यों, आप-ही-आप, बहुत-सा 
(viii) दो क्रियाओ के एक साथ प्रयुक्त होने पर -
कहना-सुनना , खाना-पीना 
(ix) मूल क्रिया साथ प्रयुक्त प्रेरणार्थक क्रिया के बीच-
सीखना-सीखाना,पीना-पीलाना 
(x) दो विशेषण पदों का संज्ञा के अर्थ में प्रयोग होने पर -
भूखा-प्यासा, अँधा-बहरा  
विराम चिन्ह किसे कहते हैं 

 (५) प्रश्न -चिन्ह- 

       प्रश्नवाचक वाक्यों  अंत में पूर्ण विराम का प्रयोग य होकर प्रश्नवाचक चिन्ह (?) लगाया जाता है, जैसे- तुम कहाँ जा रही हो ? तुम्हारा क्या नाम है ?
    इसके अतिरिक्त अनिश्चय भाव वाले वाक्यों तथा व्यंग्योक्तियो में भी प्रश्नवाचक चिन्ह लगाया जाता है, जैसे- आप शायद दिल्ली जा रहे है? , भ्रष्टाचार आजकल का शिस्टाचार है, है न ?

(६) विषमयादिबोधक चिन्ह -

     हर्ष, विषाद , विषमय, घृणा, आश्चर्य, करुणा, भय आदि भावो को व्यक्त करने वाले वाक्यों में विस्मयादिबोधक चिन्ह  प्रयोग किया जाता है, इसके साथ ही शुभकामनाए देने तथा व्यंगपूर्ण वाक्यों  भी उसका प्रयोग होता है, जैसे-
वाह ! कितनी सुन्दर  है यह लड़की !
भगवान् तुमको दीर्घ आयु दे !
उफ ! वह इतनी गंदे हो ! 
छीः छीः ! तुम इतने गंदे हो !
    कभी-कभी एक से अधिक विस्मयादिबोधक चिन्ह का प्रयोग भी एक साथ किया जाता है-
राजीव गाँधी का निधन ! शोक !! महाशोक !!!
विराम चिन्ह किसे कहते हैं 

अन्य चिन्ह-

    कुछ अन्य चिन्हो को भी विराम चिन्ह के अंतर्गत रखा जाता है। डॉ भोलानाथ तिवारी ने ऐसे चिन्हो  सन्दर्भ में लिखा है, '' यद्यपि वास्तविक रूप में इन्हे विराम चिन्ह य कहकर ' चिन्ह ' कहना अधिक उपयुक्त होगा , यों शुद्ध लेखन और पठन  की दृस्टि  से इनकी भी जानकारी अपेक्षित है। "
इस प्रकार के चिन्ह निम्नलिखित है-

(१) विवरण चिन्ह- 

किसी विषय को विस्तार से समझाने अथवा तथ्यों  विवरण देने के लिए संकेत रूप  विवरण चिन्ह ( : या :-) का प्रयोग होता है, जैसे-
(१) आज की बैठक में विचारणीय तथ्य है :
(क) पुलिस में बढ़ता भ्रस्टाचार।
(ख) पुलिस में राजनीतिक  हस्तक्षेप। 
(२ ) बीस सत्रीय कार्यक्रम इस प्रकार है :-
(क )----------------------------
(ख )----------------------------
विराम चिन्ह किसे कहते हैं 

(२) उद्धरण चिन्ह -

    यह दो प्रकार  के होते है- इकहरा  ('  ' ) तथा दोहरा ('  ') जब किसी विशेष पद , शब्द  वाक्य  को उद्धरण के रूप में लिखा जाता है , तब इकहरे उद्धरण चिन्ह का प्रयोग होता है।  जहाँ किसी पुस्तक  कोई वाक्य या अवतरण ज्यों का त्यों उद्धृत किया जाता है वहाँ दुहरे उद्धरण का प्रयोग किया जाता है।     पुस्तक,समाचार-पत्र, लेखक का उपनाम , कविता, का शीर्षक आदि लिखते समय इकहरे उद्धरण चिन्ह का प्रयोग किया जाता है, जैसे-'रामचरितमानस' तुलसीदास की सर्वश्रेष्ठ कृति है।  'हिंदुस्तान' हिंदी का एक प्रमुख दैनिक पत्र है।  अज्ञे हिंदी श्रेष्ट कवि  थे।  तिलक ने कहा था- " स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है। "

(३) कोष्ठक चिन्ह -

    लेखन में सामान्यतः (  ) कोष्ठक का ही प्रयोग होता है।  कोष्ठक के अन्य चिन्हो  प्रयोग गड़ित  में किया जाता है। 
    वाक्य में प्रयुक्त किसी शब्द या वाक्यांश को स्पष्ट करने के लिए कोष्ठक चिन्ह का प्रयोग होता है , जैसे- 
    अनेक भारतवासी बापू (महात्मा गाँधी) के अनन्य भक्त है। 
    गेट (जर्मनी का एक प्रसिद्ध कवि ) के कथन अत्यंत प्रेरणाप्रद है। 
विराम चिन्ह किसे कहते हैं 

(४) संक्षेपसूचक शब्द- 

    किसी शब्द या पद  संक्षिप्त रूप  बाद इसका प्रयोग किया जाता है। जैसे-कृ. पृ. उ. (कृपया पृष्ट उलटिये). बी० ए ० (बैचलर ऑफ  आर्ट्स ), डॉ० ( डॉक्टर ), डी ० लि ० ट ० (डाक्टर ऑफ लैटर्स/लिटरेचर)

(५) बिंदु रेखा-

    वाक्य  में लुप्त,अज्ञात या लिखे जाने योग्य अंशो को सूचित करने लिए  बिंदु रेखा (-------) का प्रयोग किया जाता, जैसे-    

(६) निर्देश चिन्ह-

    निर्देश चिन्ह (-) का प्रयोग निम्नलिखित रूप में होता है-
    जैसे- इंग्लैंड ,अमेरिका,रूस, भारत आदि। 
    बड़े आदमियों-महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचंद्र बोस की चिंतन पद्दतियाँ प्रायः समान थी। 




निपात किसे कहते हैं | nipat kise kahate hain

निपात किसे कहते हैं
निपात किसे कहते हैं

 निपात  किसे कहते है ? 

 'निपात ' अनेकार्थीवाची शब्द है। कष्क के अनुसार ''उच्चावच्चेषु अर्थेषु निपतन्तीति निपात '' निपात वस्तुतः पाद का पूरण करने वाला होता है। '' निपात पादपूरण ''इसी को लक्ष्य करके डॉ दीमशिप्त ने लिखा है कि '' निपात ऐसे सहायक शब्द है, जो शब्दों, शब्द-बँधो और पूरे वाक्यों तक को अतिरिक्त अर्थच्छटाएँ प्रदान करते है

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ek kaam karo | एक काम करो

 इक काम करो 

ek kaam karo
एक काम करो 
                                        
खाते जो हो तो माटी है,आँगन भी ये कर जाती है। 
नित नीर भी है, तो चीर भी है, गर इसकी तुम पहचान करो। 
कुछ और न हो जो दे पाओ, इस देश को तुम इक काम करो।। 

जब सरहद वाले पतझड़ में ,दूर कही उस सीमा पर,
कदमो को जैसे काठ किए,आँखों को मानो टाक दिए,
फिर धीरे-धीरे,तिनका-तिनका, भारत की गरिमा पर,
सब कुछ जिसने है वार दिया, उन वीरो का सम्मान करो। 
कुछ और न हो जो दे पाओ, इस देश को तुम इक काम करो।

और लहराती इन फसलों में,हरे भरे  जो मीत सजे, 
कहे फड़ -फड़  करती चिड़िया, तो नन्ही सी घर की गुड़िया भी,
ये देश जहा रंग सादा भी, शांति का पावन रीत लगे, 
और देकर अपना कतरा -कतरा,रंगो से लिपटी चादर में,
इक शहीद ने है कमाया,जो उस केसरी का अभिमान करो। 
कुछ और न हो जो दे पाओ, इस देश को तुम इक काम करो।। 

जब छिप करके किवाड़ों से, मौसम बरसाती जाड़ो में,
कभी होती है अनजाने में, कभी सहकर ताका झांकी भी,
क्यों लिखते हो ? ये नादानी तुम,दिल के उन अखबारों में,
और लिखते-लिखते सपनो की, दुनिया में जो तुम खो जाओ, 
हर बार नहीं इक बार सही है, इस देश को तुम मेरी जान करो।  
कुछ और न हो जो दे पाओ, इस देश को तुम इक काम करो।

क्या देखी तुमने छीना झपटी और ठग की दुनिया दारी भी, 
हां रंग भरे इस महफ़िल में,होती सच्ची है यारी भी, 
पर क्या होगा इन सबका, जो तुम अक्षर-अक्षर न लिख पाए, 
और मन मौजी इस दुनिया के, आगे जोना तुम टिक पाए,
ये स्याही वाली कूची-काठी,इनको तुम हथियार करो, 
फिर होगा सब कुछ अच्छा-अच्छा,गर शिक्षा को आधार करो,
और निसदिन तुमसे पूछेजो, कोई इस देश की राज,
बड़े शान से भी तुम कह पाओ, कुछ ऐसा भी अंजाम करो। 
कुछ और न हो जो दे पाओ, इस देश को तुम इक काम करो।
                                                              कवि :- श्री महेश कुमार बिश्वाश 








how to choose turning point in life | जीवन में टर्ननिंग प्वाइंट कैसे चुने

 जीवन में टर्ननिंग प्वाइंट कैसे चुने

जीवन में टर्ननिंग प्वाइंट कैसे चुने
जीवन में टर्ननिंग प्वाइंट कैसे चुने

जीवन में टर्ननिंग प्वाइंट कैसे चुने

नमस्कार मित्रों 

आज हम बात करेंगे एक ऐसे विषय पर जो कि हर व्यक्ति के जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। हमारा आज का विषय है " जीवन में टर्निंग प्वाइंट कैसे लाएं अर्थात जीवन में बदलाव कैसे लेकर आए...

हर व्यक्ति अपने जीवन को जीने के लिए व उसे सुचारू रूप से गतिशील बनाए रखने के लिए तरह तरह के नियमों एवं उपायों को अपनाता है , जिससे वह अपने जीवन को प्रस्नता पूर्वक  व्यतीत करता है । तो चलिए आज हम जानते है कुछ ऐसे ही नियम एवं उपाय जिसे अपनाकर हम अपने जीवन के हर लम्हें को कुशलतापूर्वक जी सकें ।

जीवन को खुशहाल व गतिशील बनाए रखने के लिए कुछ नियम व बदलाव हर किसी को अपनाना चाहिए जिससे कि वे अपने जीवन का भरपूर आनंद ले सके आइए हम आगे देखते है कि वे कौन कौन से बदलाव है जिनसे हम अपनी ज़िन्दगी को बेहतर से बेहतर बना सकते है ।

जीवन में बदलाव लाने वाले कुछ महत्वपूर्ण बिंदु -:

1- सकारात्मक विचारों को अपनाकर

2- बुरी आदतों का त्याग 

3- जीवन का लक्ष्य 

4- नकारात्मक लोगो से दूरी 

5- एक उचित दिनचर्या 

ये कुछ महत्वपूर्ण बिंदु है जिसे अपनाकर हम अपने आगामी जीवन को और अधिक खुशहाल व आनंदमय बना सकते है...आइए हम इन बिंदुओं पर पूर्ण रूप से जानकारी प्राप्त करें । और जानने का प्रयास करें कि किस तरह से हम इन नियमों को अपनाकर अपने जीवन में एक नई ऊर्जा और बदलाव कैसे लाएं।

1- सकारत्मक विचारों को अपनाकर -: 

हमारा पहला बिंदु है सकारत्मक विचारों को अपनाना जिससे हम अपने जीवन में एक अच्छा बदलाव ला सकते है लेकिन अब सबसे बड़ा प्रश्न ये उठता है कि हम इसे कैसे और किस प्रकार से अपने जीवन में अपना सकते है। सकारत्मक विचार हमें एक आनंदमय व खुशहाल जिंदगी जीने के लिए प्रेरित करती है तथा इसके साथ ही हमारे जीवन में कई सकारत्मक बदलाव आते है। हम सकारत्मक चिंतन करके व सकारत्मक लोगों के संपर्क में रहकर सकारत्मक विचारों को सरलता पूर्वक अपना सकते है तथा इसके साथ ही जीवन के कई सफलताओं को प्राप्त कर अपने जीवन में एक नई ऊर्जा व सकारातमकता ला सकते है।इसलिए हम कह सकते है कि लाइफ में टर्ननिग प्वाइंट लाने के लिए सकारत्मक विचारों का होना अति आवश्यक है। 

2- बुरी आदतों का त्याग -: 

जिस प्रकार हम साकारात्मक विचारों को अपनाकर अपने जीवन में एक नई ऊर्जा व बदलाव ला सकते है उसी प्रकार बुरी आदतों को स्वीकार करके भी हम अपने जीवन में बदलाव ला सकते है। अब हमारे सामने प्रश्न ये उठता है कि वे कौनसी बुरी आदतें है जिनका त्याग कर हम अपने जीवन में एक नया बदलाव लेकर आ सकते है। तो चलिए हम जानते है उन बुरी आदतों के बारे में...

(क) हमारे जीवन की कुछ बुरी आदतें -:
(ख) गलत वस्तुओं का सेवन 
(ग) दिनचर्या के साथ कार्य को नहीं करना 
(घ) अपने कार्य के प्रति जागरूकता नहीं रखना 
(च) अपशब्दों का प्रयोग करना 
(छ) गलत मित्रों के साथ तालमेल रखना 

ये कुछ बुरी आदतें है हमारे जीवन की जिसका त्याग कर हम अपने जीवन में एक बहुत बदलाव ला सकते है तथा अपने जीवन को खुशहाल बना सकते है। अतः जीवन में टर्न्निंग प्वाइंट लाने के लिए बुरी आदतों का त्याग करना भी जरूरी है। 

3- जीवन का लक्ष्य -: 

जीवन में साकारात्मक विचारों को अपनाकर व बुरी आदतों का त्याग करने के साथ ही साथ जीवन में लक्ष्य को तय करके चलने से भी हम अपने जीवन में बदलाव ला सकते है, क्यूंकि जब हम अपने लक्ष्य को अपने जीवन तय करके आगे बढ़ते है तो उस लक्ष्य की प्राप्ति में हमें सफलता मिलना शत प्रतिशत तय होता है कि हम अपने जीवन में अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते है। तथा समाज अपनी एक नई पहचान बना सकते है। इसलिए हर व्यक्ति को चाहिए कि वे अपने जीवन के लक्ष्य को तय करके अपने जीवन में आगे बढ़े जिससे उन्हें सफलता प्राप्ति कम कठिनाइयों से गुजरना पड़ता है और वे आसानी से सफलता है शिखर पर पहुंच सकते है। इसलिए हमें अपने जीवन बदलाव लाने के लिए व सफलता प्राप्त करने के लिए अपने जीवन के लक्ष्य को पहले से ही तय करके आगे कदम उठाने चाहिए। जीवन में टर्निंग प्वाइंट लाने के लिए जीवन का लक्ष्य निर्धारित होना भी आवश्यक है ।

4- नकारात्मक लोगों से दूरी -:

 हमें अपने जीवन में एक सकारत्मक बदलाव लाने के लिए सकारत्मक विचारों को अपनाने के साथ ही साथ नकारात्मक लोगों से दूरी रखना भी उतना कि आवश्यक है जितना जीवन में सकारत्मक विचारों को अपनाना, क्यूंकि नकारात्मक व्यक्ति के संपर्क में रहने से हमारे अंदर नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है जिससे हमारे अंदर नकारात्मक विचार स्वयं ही आने लगते है। इसलिए हमें नकारत्मक लोगों से दूरी बनाकर रखना चाहिए व उनके संपर्क में आने से बचना चाहिए ताकि जिससे उनके नकारात्मक सोच का असर हमारे जीवन पर न पड़ सके। इस प्रकार नकारात्मक लोगों से जितना हो सके उतना दूर रहकर हम अपने जीवन में एक बदलाव लकर अपने जीवन को और अधिक सरल व खुशहाल बना सकते है। नकारात्मक लोगों से दूरी भी जीवन में टर्निंग प्वाइंट के लिए महत्वपूर्ण है।

5- एक उचित दिनचर्या -: 

हम अपने जीवन में कितनी भी अच्छी चीजों को क्यों ना अपना ले लेकिन यदि हमारे पास एक उचित दिनचर्या नहीं है तो हमारे जीवन में बदलाव नहीं आ सकता। क्यूंकि एक उचित दिन चर्या ही हमें अपने कार्य के प्रति जागरूक बनाती है तथा एक उचित दिनचर्या से ही हम समय का सद उपयोग कर अपने जीवन में एक सकारत्मक बदलाव ला सकते है। अब प्रश्न ये उठता है कि हम किस प्रकार से एक सही व उचित दिनचर्या को अपनाकर अपने जीवन में बदलाव ला सकते है । नीचे कुछ ऐसे ही बिंदु है जिसको अपनाकर हम अपनी दिनचर्या को बेहतर बना सकते हैं-:

1- समय पर सोना व समय पर उठना एक अच्छी दिनचर्या में आता है ।
2- अपने कार्य को समय पर पूर्ण करना। 
3- समय पर भोजन आदि करना ।
4- अपने सभी कार्यों को करने के लिए एक उचित समय व समय सीमा को ध्यान में रखना ।
5- समय के अनुसार अपनी दिनचर्या में फेर बदल करते रहना ताकि रोज हमें एक अच्छी दिनचर्या प्राप्त हो सकें। 

ये कुछ महत्वपूर्ण बातें है, जिनको ध्यान में रखकर हम अपनी दिनचर्या को बेहतर बना सकते है तथा साथ ही अपनी ज़िन्दगी में एक सकारत्मक बदलाव भी ला सकते है। इसप्रकर एक उचित दिनचर्या भी जीवन में टर्निंग प्वाइंट ला सकता है। 

इस प्रकार ये कुछ महत्वपूर्ण बिंदु थे जिनका जिक्र हमने पूर्ण रूप से आपके समक्ष किया । जिसे अपनाकर व ध्यान में रखकर हम लोग अपनी ज़िन्दगी में एक नई ऊर्जा के साथ ही साथ एक सकारत्मक परिवर्तन भी ला सकते है । ये परिवर्तन हमारे जीवन उत्साह, खुशहाली , सफलता व निरंतर गातिमान रहने के लिए अति महत्वपूर्ण माने जाते है। इन्हें अपनाकर हम एक स्वस्थ जीवन के साथ साथ एक सफल व सकारत्मक जीवन भी प्राप्त कर सकते है। इसलिए इन नियमों को समाज के हर व्यक्ति चाहे वे किसी भी युवा वर्ग के हो सभी को अपनाना चाहिए जिनसे उनके जीवन में सकारात्मकता के साथ साथ सफलता का भी आगमन होता है। और इन्हें अपनाकर हर व्यक्ति अपने जीवन के सभी सुखों का आनंद प्राप्त करने में सक्षम रहता है। 

निष्कर्ष -: 

अंततः हम कह सकते है कि एक सफल जीवन व्यतीत करने के लिए व जीवन को सुखदाई बनाने के लिए जीवन में सकारत्मक विचारों को अपनाना, सकारत्मक लोगों के संपर्क में रहना, जीवन का लक्ष्य निर्धारित होना,नकारात्मक लोगों से दूरी बनाकर रखना व एक उचित दिनचर्या का होना अति आवश्यक है। जिन्हें अपनाकर हम अपने जीवन में एक नया बदलाव व एक नई ऊर्जा ला सकते हैं। व जीवन के सभी पलों को खुलकर सफलता के साथ व्यतीत कर सकते है। अंततः हम कह सकते है कि जीवन में टर्निंग प्वाइंट लाने के लिए इन सभी बिंदुओं को अपनाना अति आवश्यक है ।

इस प्रकार जीवन में टर्निंग प्वाइंट कैसे लाए इस विषय पर हमारी चर्चा पूर्ण होती है मैंने आशा करता हूं कि मेरे द्वारा दी गई जानकारी आपके जीवन में एक नया बदलाव लाने के साथ साथ उपयोगी हो । व इससे आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आए। जीवन में टर्निंग प्वाइंट कैसे लाए विषय पर हमारी ये चर्चा यही समाप्त होती है। 

                                                          जय हिन्द, जय भारत


acharya hazari prasad dwivedi ka jeevan paricha | आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जीवन परिचय

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जीवन परिचय

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जीवन परिचय
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी


आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जीवन परिचय

आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी जी का जन्म सन 1907 ई० में बलिया जिले के दुबे का छपरा नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री अनमोल द्विवेदी एवं माता का नाम श्रीमती ज्योतिषमति था।

इनकी शिक्षा का प्रारम्भ संस्कृत से हुआ। इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद इन्होने काशी हिन्दुविश्विद्यालय से ज्योतिष तथा साहित्य में आचार्य की उपाधि प्राप्त की। 

सन १९४० ई० में हिंदी एवं संस्कृत के अध्यापक के रूप में शांति निकेतन चले गए।  यही इन्हे विश्वकवि रविंद्रनाथ टैगोर का सानिध्य मिला और साहित्य सृजन की ओर अभिमुख हो गए।  

१९५६ ई० में काशी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अध्यक्ष नियुक्त हुए।  कुछ समय तक पंजाब विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया। सन १९४९ ई० में लखनऊ विश्वविद्यालय ने इन्हे 'डी० लिट०' तथा सन  १९५७ ई० में भारत सरकार ने 'पदमभूषण' की उपाधि से विभूषित किया। १८ मई, १९७९ ई० को इनका देहावसान हो गया। 

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का साहित्यिक परिचय

आचार्य द्विवेदी जी ने बाल्यकाल से ही श्री व्योमकेश शास्त्री से कविता लिखने की कला सीखनी आरम्भ कर दी थी। शांति-निकेतन पहुंचकर इनकी प्रतिमा और और अधिक निखारने लगी। कवीन्द्र रविंद्र का इन पर विशेष प्रभाव पड़ा। 

बांग्ला साहित्य से भी ये बहुत प्रभावित थे। ये उच्चकोटि के शोधकर्ता, निबंधकार, उपन्यासकार एवं आलोचक थे।  सिद्ध साहित्य, जैन  साहित्य एवं अपभ्रंश साहित्य को प्रकाश में लाकर तथा भक्ति-साहित्य पर उच्चस्तरीय समीक्षात्मक ग्रंथो की रचना करके इन्होने हिंदी साहित्य की महान सेवा की।

 

वैसे तो द्विवेदी जी ने अनेक विषयो पर उत्कृष्ट कोटि  निबंधों एवं नवीन शैली पर आधारित उपन्यासों की रचना की है, पर विशेष रूप से वैयक्तिक एवं भावात्मक निबंधों की रचना करने में ये अद्वितीय रहे। 

 द्विवेदी जी 'उत्तर प्रदेश ग्रन्थ अकादमी' के अध्यक्ष और 'हिंदी संस्थान'  उपाध्यक्ष भी रहे।  कबीर पर उत्कृष्ट आलोचनात्मक कार्य करने के कारण  इन्हे 'मंगलात्मक' पारितोषिक प्राप्त हुआ।  इसके साथ हे 'सूर-साहित्य' पर 'इंदौर-साहित्य समिति' ने 'स्वर्ण-पदक' प्रदान किया। 

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की रचनाएँ

द्विवेदी जी की प्रमुख कृतियाँ इस प्रकार है -

निबंध-   'कुटज', 'साहित्य के साथी', 'कल्पलता', 'विचार-प्रवाह', 'आलोक पर्व' , 'विचार और वितर्क', 'कल्पना', 'अशोक के फूल' आदि। 

उपन्यास - 'पुननर्वा', 'बाणभट्ट की आत्मकथा', 'चारु चन्द्रलेख', 'अनामदास का पोथा' 
आलोचनात्मक साहित्य - 'सूर-साहित्य', कबीर', 'सूरदास और उनका काव्य', 'हमारी साहित्यिक समस्याए', 'हिंदी साहित्य की भूमिका', 'साहित्य का साथी', 'साहित्य का धर्म', 'हिंदी-साहित्य', 'समीक्षा-साहित्य', 'नख-दर्पण में हिन्दी-कविता', 'साहित्य का मर्म', 'भारतीय वाड्मय', 'कालिदास की लालित्य-योजना' आदि। 

शोध साहित्य - 'प्राचीन भारत का कला विकास', 'नाथ संप्रदाय', 'मध्यकालीन धर्म साधना', 'हिंदी-साहित्य का आदिकाल' आदि। 


अनुदित साहित्य - 'प्रबंध चिंतामणि', 'पुरातन-प्रबंध-संग्रह', 'प्रबंधकोश', 'विश्व परिचय', मेरा बचपन', 'लाल कनेर' आदि। 

सम्पादित साहित्य - 'नाथ-सिद्धो की बाणिया', 'संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो', 'सन्देश-रासक' आदि। 
भाषा-शैली - द्विवेदी जी भाषा के प्रकांड पंडित थे। संस्कृतनिष्ट शब्दावली के साथ साथ आपने निबंधों में उर्दू, फ़ारसी, अंग्रेजी एवं देशज शब्दों का भी प्रयोग किया है।  


इनकी भाषा प्रौढ़ होते हुए बी सरल, सयंत तथा बोधगम्य है।  मुहावरेदार भाषा का प्रयोग भी इन्होने किया है।  विशेष रूप इनकी भाषा शुद्ध संस्कृतनिष्ट साहित्यिक खड़ीबोली है।  इन्होने अनेक शैलियों का प्रयोग विषयनुसार किया है , जिनमे प्रमुख है-गवेषणात्मक शैली, आलोचनात्मक शैली, भावात्मक शैली, हास्य-व्यंगात्मक शैली, उद्धरण शैली। 

गुरुनानक देव में मानवतावादी मूल्यों  सहज सन्निवेश पाने के लिए द्विवेदी जी भाव- पेशट ही गए है।  प्रस्तुत निबंध 'गुरु नानकदेव ' में निबंध की समस्त विशेषताए उपस्थित है।  इस निबंध में स्थान स्थान पर उपमा, रूपक एवं उत्प्रेक्षा अलंकारों का प्रयोग लेखक ने किया है।